भारत को नाज़ है चेस के ग्रैंड मास्टर-प्रज्ञाननंदा पर

प्रज्ञाननंदा ने अपने कम उम्र में इतना बड़ा नाम हासिल करके के लोगो की प्रेणा बन गये है। हाली में चल रहे FIDE चेस वर्ल्ड कप में उन्होंने भारत का नाम रोशन किया। और वर्ल्ड के दिकज चेस खिलाडी को हरा कर फाइनल में जगह बनानी। और फिनाले में भी खूब अच्छा प्रदर्शन किया भले ही उनकेल हाथ का जीत का किताब नही लगा पर उन्होंने करोड़ो लोगो का दिल जीत लिया।

फिनाले मैच 

प्रज्ञाननंदा के रनर उप बने पर उनको कई बड़े बड़े लोगो ने जसे गृहमंत्रीअमित शाह, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, राष्ट्रपति मुनमुन, उत्तर प्रदेश के मुख्मंत्री योगी आदित्यनाथ, सचिन तेंदुलकर के बड़े नामो  ने बधाई दी और भविष्य में होने वाले गेम में भी अच्छा करे ऐसी शुभकामनाये थी! फबिनो को हरा कर प्रज्ञाननंदा की फिनाले की राह खुली जहा उनका सामना वर्ल्ड नंबर 1 चेस खिलाडी मगनस कार्लसन से हुआ। जहा पहले दो मैच में दोनों के बीच ड्रा हुआ। और गुरवार को टाई ब्रेकर में कार्लसन ने कड़े मुकाबले में प्रज्ञाननंदा को हरा FIDE चेस वर्ल्ड कप के विजेता बने। इस गेम में 2 बजिया खेली गयी। पहला टाई ब्रेकर 47 चाल तक चला जिसमे प्रज्ञाननंदा को शिकस्त मिली और दूसरे गेम में भी कार्सलें ने अच्छा खेला और किताब अपने नाम किया! जीत पर उन्हें 90 लाख रूपए मिले वही प्रज्ञाननंदा को 66 लाख रूपए मिले।

प्रज्ञाननंदा की सफलता का राज

प्रज्ञाननंदा की सफलता का राज उनके परिवार और उनकी मेहनत को जाता है। 18 साल के इस लड़के से हम सबको बहुत सिख मिलती है। चेस को लेकर उनकी रूचि उनकी बहन से आई। प्रज्ञाननंदा का जनम एक मध्यवर्गी परिवार में हुआ जहा वो बाकि बच्चो से अलग है  जहा बच्चे अन्य चीजों में उल्च जाते है वही प्रज्ञाननंदा 3 साल की उम्र से चेस खेलना शुरू कर दिया और जल्द ही इस फील्ड के मास्टर कहलाने लग गये। उनका फोकस गेम को लेकर काफी रहा नतीजा ये हुआ की जहा लोग अपने भविष्य की सोचते नही वह उन्होंने अपने देश और परिवार का नाम रोशन किया और जब 2001 के समय विश्वानन्द के चेस के ग्रांडमास्टर थे प्र्ग्यान्नान्दा का उस समय जनम भी नही हुआ था और आज  उन्हें विश्वानन्द जसे  महान खिलाडी है उनसे प्रसंसा मिल रही है।

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